Wednesday, January 27, 2010

भोतीकतावाद की भेंट चड़ी बबली की गोद ......कट गई नवजात की जीवन डोर

आजादी के बादहमने पश्चिम की नक़ल का उपभोक्तावाद को अपनाया जिसमें अर्थ को सर्वोपरि स्थान मिला हुवा है. इसी उपभोक्तावादी संस्कृति के संक्रमण से हमारा समाज स्वार्थी एवं व्यक्तिवादी होता जा रहा है जिसमें हमारे सदियों से स्थापित संस्कारों एवं आदर्शों को तिरोहित कर वाजिब गेर्वजिब तरीके से धन संग्रह महत्वपूर्ण होता जा रहा है। हमारे समाज में व्याप्त हो रही इसी प्रवृति का वीभत्स एवं रोंगटे खड़े कर देने वाला वाकया पिछले दिनों उदयपुर के सरकारी हॉस्पिटल में घटित हुआ। गत १९ जनवरी को उदयपुर के पास केलवाडा निवासी बबली पत्नी रणजीत मेघवाल की स्थानीय जनाना चिक्तिसालय में सिजेरियन डिलीवरी के दौरान चिकित्सकों की लापरवाही से नवजात शिशु का हाथ कंधे से करीब आधा कट गया। डाक्टरों ने अपनी लापरवाही छुपाते हुए नवजात के घाव पर बिना टाँके लगाये नर्सरी में भेज दिया। वहां से वापस उसे बच्चों के सर्जन के पास तो उसके बाद हड्डियों के विशेषज्ञ के पास दौड़ाने के उपरांत भी लगातार तीन दिनों तक उसकी कोई सुध नहीं ली। नवजात के शारीर में फैले संक्रमण से एवं समय पर सही इलाज नहीं मिलने से शारीर पीला पद कर उसकी जीवन डोर कट गई। मानवीय संवेदनाओं को तर तर करने वाली इस हृदय विदारक घटना के शहर में फैलने के बाद भी तीन दिनों में कोई चिकित्सक बच्चे को देखने नंही आया केवल दिन में एक नर्सिंगकर्मी ने बच्चे के घाव पर मरहम पट्टी करदी। जनाना चिकित्सालय की अधीक्षक इसे नार्मल बात कहते हुवे इससे भी बड़ी घटनाएँ होते रहने की बात कहते हुवे चिकित्सकों की लापरवाही मानने से मन कर दिया। जब जिलाधीश ने जाँच कमिटी बना कर जाँच की रिपोर्ट मांगी तो रिपोर्ट को सीधे राज्य सरकार के पास भेजते हुवे ओपरेशन के दौरान पेट से हाथ बहार निकलने पर चिकित्सकों द्वारा हाथ पकड़ कर जोर से हाथ खींचने के दौरान कंधे सा हाथ फटना बताया। सरकार ने चिकित्सकों के विरुद्ध जांच बिठा दी है एवं पुलिस में प्रकरण भी दर्ज करवा दिया। परन्तु क्या इससे जो नवजात दुनिया देखने से पूर्व ही चल बसा उसकी भरपाई संभव हो सकेगी। क्या इससे बबली की सूनी हुई गोद की भरपाई हो सकेगी। इस घटना के घटित होने पर लोगों के प्रदर्शन व् ज्ञापन के बावजूद भी नवजात को तीन दिन तक चिकित्सा नहीं मिली। नवजात की माँ ने उससे मिलने आये उसके क्षेत्र के विधायक से पूरे जनाना चिकित्सालय में उसको चार वार्ड बदलवाने एवं चिकित्सकों द्वारा धमकाने की शिकायत की। स्थानीय जनसेवकों में से कोई भी अपनी व्यस्तातावश बबली से मिलने नहीं आसका।

उक्त वाकये से यह ध्वनित होता है की जनता की गाड़े पसीने की कमी से जो चिकित्सक तैयार किये जाते है एवं जो अपनी चिकित्सकीय डिग्री लेते वक्त पूर्ण संवेदना के साथ बिना किश उंच नीच, गरीबी अमीरी, बिना किसी लालच प्रलोभन के पूर्ण मनोयोग से रोगी की सेवा कर उस स्वस्थ करने की शपथ एवं संकल्प लेते है एवं आज भी जनता द्वारा चुकाए जा रहे कर से मोटी तनख्वाह पाने के बावजूद वे आज ऐसे अमानवीय, स्वेछाचारी व लापरवाह कैसे होते जा रहे है एवं मानव जीवन के साथ खिलवाड़ के बावजूद उनमें कोई शर्मिंदगी नंही है। कहाँ गए हमारे उच्च आदर्श व् सामाजिक संस्कार जिनमें दया, परोपकार, निःस्वार्थ सेवा, कर्ताव्यनिस्था एवं नैतिकता जिसका पाठ घुट्टी के रूप में हमारी प्राम्भिक शिक्षा से उच्च शिक्षा स्तर तक पिलाने के साथ साथ हमारे धर्म एवं संस्कृति का हमारे जन्म से अहम् हिस्सा रहता आया है। यह एक शोचनीय पहलु है। लोगों में चर्चा है की अगर बबली सरकारी चिकित्सकों की वर्तमान परिपतिनुसार उनके घर जाकर उनकी फीस देकर डाक्टर के घरकी पर्ची से हॉस्पिटल में दाखिल होती तो ऐसी लापरवाही नहीं होती एवं न ही उसकी गोद सूनी होती एवं न ही उसे धमकाया या प्रताड़ित किया जाता। पर जब इन गरीब बबलियों के पास डॉक्टर को घर जाकर देने की फीस नहीं हो तो ऐसी घटना इन चिकित्सकों के लिए सामान्य ही कही जाएगी। आज पश्चिम का भोतिकवाद एवं बाजारवाद हमारे ऊपर इतना हावी हो गया है की हम इतने व्यक्तिवादी एवं स्वार्थी हो गए है की समाज द्वारा सदियों से स्थापित संस्कारों को रौंदते हुवे संवेदनहीन होकर शास्वत मानवीय नैसर्गिक संवेदनाओं के तार तार होने पर भी हम मूक दर्शक होकर प्रतिक्रिया या विरोध व्यक्त करने में भी हिचक महसूस करते है जिससे ऐसे लापरवाह, संवेदनहीन एवं स्वार्थी लोगों के होंसले बुलंद होते रहेंगे । तथा फिर किसी अन्य गरीब बबली की गोद सूनी होगी या समाज का दूसरा कोई साधनहीन गरीब असमय इस संसार से विदा ले लेगा.


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