प्रगतिवाद के नाम पर हिन्दुओं के निजी कानूनों से छेड़छाड़ कहाँ तक उचित है?
पश्चिम के उपभोक्तावाद एवं प्रगतिवाद की देखा देखि महिला सशक्तिकरण के नाम पर हिंदू समाज के कानूनों में समय समय पर बिना जांचे परखे संशोधन करके कानून बनने वालों ने अपने आप को प्रगतिवादी एवं सुधारवादी होने की पीठ थपथपाई है। हिंदू समाज की संरचना एवं विकास उस समय हो गया था जब पश्चिम के तथाकथित सुधारवादी जंगलों में नंगे रहते थे। पश्चिम के आज के नारी के खुलेपन एवं वासनात्मक उपभोक की प्रक्रिया से हम आज से हजारों वर्ष पूर्व गुजर चुके हैं। उसका दिग्दर्शन खजुराहो एवं देलवाडा के मंदिरों के शिल्प एवं संस्कृत के तत्कालीन साहित्य में किया जा सकता है। हमारे समाज के तत्कालीन चिंतकों को आज हम अनेक ऋषि मुनिओं के नामों से जानते है. समाज के इस दौर से गुजरने को उन्होंने निकटता से देखा, अनुभव किया एवं उसका दूरगामी प्रभावों पर चिंतन कर मनुष्य के आदर्श समाज की स्थापना हेतु उन्होंने समाज में मानव के जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक इसे नियमों की संरचना की जो मानव विकास की पूरानी परम्पराओं के साथ साथ ऐसी आदर्श व्यवस्था जो सर्वकालिक एवं सार्वभोमिक होकर उसका समाज के प्रत्येक सदस्य मानने को बिना राज भय के आबद्ध करने को प्रेरित किया. इन नियमों को धर्म संगत बनाने से संपूर्ण हिंदू समाज ने इसे मान्य किया। यही कारण है की आज तक अनेकों विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमणों एवं विभिन्न सांस्कृतिक आक्रमणों के बावजूद भी आचार्य मनु, चाणक्य, पतंजलि, व्यास, भृगु, गौतम, वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा गाँधी आदि चिंतकों द्वारा प्रस्थापित नियमों एवं परम्पराओं से समाज आज भी अविचल रूप से आबद्ध है। महर्षि मनु ने मनुस्मृति में समाज की वर्णव्यवस्था का निरूपण किया जिसमे मधुमखी के छत्ते की तर्ज पर चार वर्णों की संकल्पंना कर के प्रत्येक वर्ग के कार्यों का निर्धारण किया गया. इनका समय समय पर पुनरीक्षण एवं पुनर्वालोकन करके अनुपयोगी अंश को हटा कर जीवंत समाज के उपयोगी तत्वों का समावेश भी किया गया ।
नारी को सदा से ही हिंदू समाज ने अत्यन्त सम्माननीय स्थान दिया है। उसे पुरूष की अर्धांगिनी, विश्वासपात्र मित्र, लक्ष्मी, गृहस्वामिनी मानते हुए कहा गया की जिस घर में नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है. नारी को पश्चिम की तरह भोग की वस्तु नंही माना है। विवाह महिला एवं पुरूष का एक ऐसा पवित्र अटूट बंधन है जो सात जन्मों तक बने रहने की कल्पना की गयी है. विवाह भोग करने हेतु नही होकर स्त्री पुरूष को संतान उत्पन कर अपनी वंश वृदि कर पित्र ऋण से मुक्त होने का साधन बताया है। विवाह में तलाक़ का कोई स्थान नही बताया। परस्त्रीगमन या परपुरुष गमन या विवाहेतर संबंधों को हेय एवं पाप माना गया। विवाह को वासनापूर्ति का साधन न होकर अपनी वंश वृदि के दायित्व के निर्वहन हेतु
आवश्यक बताया गया। यह बात अलग है की इस दायित्व के निर्वहन में उनकी प्रकृति जन्य वासनापूर्ति भी हो जाती. बिना विवाह के पुरूष या स्त्री को पूर्ण नही माना गया.
हमारे मनीषियों ने स्त्री स्वाभाव का सुक्ष्म मनोविज्ञानिक अध्ययन कर पाया की महिला का स्वतंत्र रहना उसकी प्रकृति के अनुकूल नही माना। उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी का अवलंबन आवश्यक माना गया। बचपन में माता पिता, युवावस्था में पति एवं बुदापे में बेटे की देखरेख में रहना आवश्यक माना गया। स्त्री मनोविज्ञान के अनुसार आज भी हम देखते है की अनेकों पढ़ी लिखी ऊँचे पदों पर आसीन महिलाएं भी स्वतंत्र न होकर अपनी आमदनी प्रति माह पति महोदय को भेंट करती है एवं घर में कभी कभी पति प्रताड़ना की शिकार होती रहती है। इस प्रकार जब ऐसी सशक्त महिलाये भी अपने घर में असहाय हो जाती है तो एक साधारण महिला के बारे में कल्पना करे की मात्र कानूनी प्रावधानों के निर्माण से वे सशक्त हो जावेंगी। यह एक सोचनीय पहलु है। आदमी के नैतिक पक्ष को मजबूत बनाए बिना केवल कानून बनाने से आज के इस घोर आर्थिक युग में महिला सशक्तिकरण दूर की कोडी होगी।
आज हिंदू समाज में तलाक़ को कानूनी मान्यता मिल गई है। इसके उपरांत भी महिला प्रताड़ना रोकने हेतु भारतीय दंड संहिता की धारा ४९८ ऐ द्वारा सुरक्षा की व्यवस्था की गयी। दांपत्य जीवन के छोटेमोटे मनमुटाव में अब इस शस्त्र का प्रचुरता से प्रयोग होने से विवाह संस्था कमजोर होने के साथ साथ अब उक्त धारा पतिउत्पिडक होगई है. दूसरी और समाज में परित्यक्ता या पुनर्विवाहित महिला को सम्मान दूसरी श्रेणी का दिया जाता है। आज आधुनिक समझने वाले परिवार भी प्रेम विवाह को आसानी से स्वीकार करने में हिचकिचाते है। अच्छी पढ़ी लिखी आधुनिक लड़कियां भी प्रेम विवाह की बजाय अपने माता पिता द्वारा तय किए जाने वाले रिश्तों को स्वीकार करना पसंद करती है चूँकि ऐसे रिश्तों में सामाजिक सुरक्षा होती है। प्रेम विवाह में सामाजिक सुरक्षा का आभाव होने से सामाजिक अलगाव का दंश उनके साथ साथ उनकी संतानों को भी भुगतना पड़ता है।
महिला सशक्तिकरण के तहत महिलाओं को अपने परिवार की पैतृक सम्पति में भाइयों के बराबर का हिस्सेदार बनाने के प्रावधान हिंदू विधि में किए गए है। इन प्रावधानों ने महिलाओं को सशक्त करने के बजाय सदियों से भाई बहिनों के मध्य आदर्श प्रेम एवं सोहाद्र समाप्त होकर पारिवारिक तनाव, विगटन एवं वैमनस्य पैदा करने का कारक बन गया है। हिंदू रीती रिवाजों में वर को भारी तिलक, आभूषण, वस्त्र एवं लड़की को दहेज़ देकर धूम धाम से ससुराल विदा किया जाता है। सात फेरों के समय उसे भविष्य में पति के घर को एवं पति के परिवार को उसका होने का अहसास करवाने के साथ साथ देहरी पूजन, अक्षत फिक्वाकर ढोल दिलवाकर (ढोल मनुष्य के मरने के बारहवे दिन दिया जाता है की मृतात्मा का अब इस परिवार से सदा के लिए सम्बन्ध विच्छेद हो गया है) कर ससुराल विदा किया जाता है। ढोल देकर उसे यह अहसास कराया जाता है की अब उसका पीहर से अलगाव हो चुका है, उसकी गोत्र भी ससुराल पक्ष की होगई एवं उसके मरने पर उसका सूतक तक पीहर पक्ष को नही लगेगा. इसके उपरांत भी पीहर पक्ष का दायित्व समाप्त नंही हो जाता। लड़की के गौने, प्रथम प्रसव का खर्च, एवं उसके ससुराल में खुशी तथा गमी, उसकी अपनी संतान के विवाह में मायरा आदि अवसरों पर पीहर पक्ष द्वारा समय समय पर नकद, वस्त्र, आभूषण देना होता है। अगर ससुराल वाले लड़की को छोड़ देते है तो उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी भी पीहर पक्ष की होती है। इसके उपरांत पीहर पक्ष द्वारा उसके सारे रीतिरिवाजों के पूरा करने के उपरांत जब उसका पिता मरता है तो वह पैतृक सम्पति में भाई के बराबर का हिस्सा दिए जाने की कानून सम्मत मांग करती है तो यह उसके पीहर पक्ष के लिए बड़ा ही पीडादायक होता है। एक मध्यम वर्गीय परिवार पैतृक सम्पति में मिलनेवाले हिस्से से अधिक पाहिले ही खर्च कर चुका होता है। अधिकतर लड़किया अपने ससुराल वालों की लालची प्रवृति में सहयोग देकर अपना हिस्सा लेकर आपने पीहर पक्ष का प्रेम, सोहाद्र समाप्त कर अपने हिस्से को ज्यादा कीमत देने वाले को बेच कर परिवार की जायदाद का विखंडन कराने की कारक होती जा रही है. लड़की का विवाह वैसे भी दूसरे गांव या शहर किया जाता है। दूर गांव या शहर में रहकर वह पीहर की सम्पति की देखभाल करने में वैसे ही वह असमर्थ होती है तो फ़िर उसका हिस्सा लेना कहाँ तक उचित है.
हिंदू समाज में प्रचलित हजारों वर्षों से चले आरहे रीतिरिवाजों को आधुनिकता के परिवेश में बिना उसके दूरगामी प्रभावों का अध्ययन किए, बिना पब्लिक डिबेट के हमारे प्रगतिशील विचारधारा के पुरोधा इस प्रकार केवल हिंदू समाज के कानूनों में हस्तक्षेप कर अपनी पीठ थपथपा सकते है परन्तु अन्य संप्रदाय के कानूनों में उनकी तनिक भी दखलंदाजी करने की हिम्मत नही होती. इन्दोर की शाहबानो के प्रकरण में बावजूद उच्चतम न्यायालय के आदेशों के संविधान संशोधन द्वारा उक्त समुदाय के निजी कानून में हस्तक्षेप रोका गया। तो फ़िर भारत में केवल हिंदू कानून ही मात्र दखान्दाजी के योग्य है। कहाँ गयी भारत में सामान नागरिक संहिता लागु करने की बात। क्या प्रगतिशीलता का ठेका मात्र हिंदू कानूनों में बदलाव से ही है। सरकार की इस अनावश्यक निजी कानूनों में हस्तक्षेप ने विभिन्न समुदायों को त्रस्त कर रखा है। इसका तोड़ किसी समुदाय में तो परिवार की विधवा को चादर ओड़कर सम्पति विभाजन रोकने का रास्ता अपनाया जाता है तो अन्य समुदायों में लड़की को मान मनोव्वल कर रुपया देकर उससे उसका हिस्से का १०० रूपये के स्टांप पर त्याग पत्र लिखवा कर पारिवारिक सम्पति का विभाजन रोकने के प्रयास किए जाते है.