Thursday, April 23, 2009

बहिनों के पैतृक सम्पति के अधिकार का औचित्य

प्रगतिवाद के नाम पर हिन्दुओं के निजी कानूनों से छेड़छाड़ कहाँ तक उचित है?



पश्चिम के उपभोक्तावाद एवं प्रगतिवाद की देखा देखि महिला सशक्तिकरण के नाम पर हिंदू समाज के कानूनों में समय समय पर बिना जांचे परखे संशोधन करके कानून बनने वालों ने अपने आप को प्रगतिवादी एवं सुधारवादी होने की पीठ थपथपाई है। हिंदू समाज की संरचना एवं विकास उस समय हो गया था जब पश्चिम के तथाकथित सुधारवादी जंगलों में नंगे रहते थे। पश्चिम के आज के नारी के खुलेपन एवं वासनात्मक उपभोक की प्रक्रिया से हम आज से हजारों वर्ष पूर्व गुजर चुके हैं। उसका दिग्दर्शन खजुराहो एवं देलवाडा के मंदिरों के शिल्प एवं संस्कृत के तत्कालीन साहित्य में किया जा सकता है। हमारे समाज के तत्कालीन चिंतकों को आज हम अनेक ऋषि मुनिओं के नामों से जानते है. समाज के इस दौर से गुजरने को उन्होंने निकटता से देखा, अनुभव किया एवं उसका दूरगामी प्रभावों पर चिंतन कर मनुष्य के आदर्श समाज की स्थापना हेतु उन्होंने समाज में मानव के जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक इसे नियमों की संरचना की जो मानव विकास की पूरानी परम्पराओं के साथ साथ ऐसी आदर्श व्यवस्था जो सर्वकालिक एवं सार्वभोमिक होकर उसका समाज के प्रत्येक सदस्य मानने को बिना राज भय के आबद्ध करने को प्रेरित किया. इन नियमों को धर्म संगत बनाने से संपूर्ण हिंदू समाज ने इसे मान्य किया। यही कारण है की आज तक अनेकों विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमणों एवं विभिन्न सांस्कृतिक आक्रमणों के बावजूद भी आचार्य मनु, चाणक्य, पतंजलि, व्यास, भृगु, गौतम, वाल्मीकि, गोस्वामी तुलसीदास, महात्मा गाँधी आदि चिंतकों द्वारा प्रस्थापित नियमों एवं परम्पराओं से समाज आज भी अविचल रूप से आबद्ध है। महर्षि मनु ने मनुस्मृति में समाज की वर्णव्यवस्था का निरूपण किया जिसमे मधुमखी के छत्ते की तर्ज पर चार वर्णों की संकल्पंना कर के प्रत्येक वर्ग के कार्यों का निर्धारण किया गया. इनका समय समय पर पुनरीक्षण एवं पुनर्वालोकन करके अनुपयोगी अंश को हटा कर जीवंत समाज के उपयोगी तत्वों का समावेश भी किया गया ।

नारी को सदा से ही हिंदू समाज ने अत्यन्त सम्माननीय स्थान दिया है। उसे पुरूष की अर्धांगिनी, विश्वासपात्र मित्र, लक्ष्मी, गृहस्वामिनी मानते हुए कहा गया की जिस घर में नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है. नारी को पश्चिम की तरह भोग की वस्तु नंही माना है। विवाह महिला एवं पुरूष का एक ऐसा पवित्र अटूट बंधन है जो सात जन्मों तक बने रहने की कल्पना की गयी है. विवाह भोग करने हेतु नही होकर स्त्री पुरूष को संतान उत्पन कर अपनी वंश वृदि कर पित्र ऋण से मुक्त होने का साधन बताया है। विवाह में तलाक़ का कोई स्थान नही बताया। परस्त्रीगमन या परपुरुष गमन या विवाहेतर संबंधों को हेय एवं पाप माना गया। विवाह को वासनापूर्ति का साधन न होकर अपनी वंश वृदि के दायित्व के निर्वहन हेतु
आवश्यक बताया गया। यह बात अलग है की इस दायित्व के निर्वहन में उनकी प्रकृति जन्य वासनापूर्ति भी हो जाती. बिना विवाह के पुरूष या स्त्री को पूर्ण नही माना गया.

हमारे मनीषियों ने स्त्री स्वाभाव का सुक्ष्म मनोविज्ञानिक अध्ययन कर पाया की महिला का स्वतंत्र रहना उसकी प्रकृति के अनुकूल नही माना। उसके जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी न किसी का अवलंबन आवश्यक माना गया। बचपन में माता पिता, युवावस्था में पति एवं बुदापे में बेटे की देखरेख में रहना आवश्यक माना गया। स्त्री मनोविज्ञान के अनुसार आज भी हम देखते है की अनेकों पढ़ी लिखी ऊँचे पदों पर आसीन महिलाएं भी स्वतंत्र न होकर अपनी आमदनी प्रति माह पति महोदय को भेंट करती है एवं घर में कभी कभी पति प्रताड़ना की शिकार होती रहती है। इस प्रकार जब ऐसी सशक्त महिलाये भी अपने घर में असहाय हो जाती है तो एक साधारण महिला के बारे में कल्पना करे की मात्र कानूनी प्रावधानों के निर्माण से वे सशक्त हो जावेंगी। यह एक सोचनीय पहलु है। आदमी के नैतिक पक्ष को मजबूत बनाए बिना केवल कानून बनाने से आज के इस घोर आर्थिक युग में महिला सशक्तिकरण दूर की कोडी होगी।

आज हिंदू समाज में तलाक़ को कानूनी मान्यता मिल गई है। इसके उपरांत भी महिला प्रताड़ना रोकने हेतु भारतीय दंड संहिता की धारा ४९८ ऐ द्वारा सुरक्षा की व्यवस्था की गयी। दांपत्य जीवन के छोटेमोटे मनमुटाव में अब इस शस्त्र का प्रचुरता से प्रयोग होने से विवाह संस्था कमजोर होने के साथ साथ अब उक्त धारा पतिउत्पिडक होगई है. दूसरी और समाज में परित्यक्ता या पुनर्विवाहित महिला को सम्मान दूसरी श्रेणी का दिया जाता है। आज आधुनिक समझने वाले परिवार भी प्रेम विवाह को आसानी से स्वीकार करने में हिचकिचाते है। अच्छी पढ़ी लिखी आधुनिक लड़कियां भी प्रेम विवाह की बजाय अपने माता पिता द्वारा तय किए जाने वाले रिश्तों को स्वीकार करना पसंद करती है चूँकि ऐसे रिश्तों में सामाजिक सुरक्षा होती है। प्रेम विवाह में सामाजिक सुरक्षा का आभाव होने से सामाजिक अलगाव का दंश उनके साथ साथ उनकी संतानों को भी भुगतना पड़ता है।

महिला सशक्तिकरण के तहत महिलाओं को अपने परिवार की पैतृक सम्पति में भाइयों के बराबर का हिस्सेदार बनाने के प्रावधान हिंदू विधि में किए गए है। इन प्रावधानों ने महिलाओं को सशक्त करने के बजाय सदियों से भाई बहिनों के मध्य आदर्श प्रेम एवं सोहाद्र समाप्त होकर पारिवारिक तनाव, विगटन एवं वैमनस्य पैदा करने का कारक बन गया है। हिंदू रीती रिवाजों में वर को भारी तिलक, आभूषण, वस्त्र एवं लड़की को दहेज़ देकर धूम धाम से ससुराल विदा किया जाता है। सात फेरों के समय उसे भविष्य में पति के घर को एवं पति के परिवार को उसका होने का अहसास करवाने के साथ साथ देहरी पूजन, अक्षत फिक्वाकर ढोल दिलवाकर (ढोल मनुष्य के मरने के बारहवे दिन दिया जाता है की मृतात्मा का अब इस परिवार से सदा के लिए सम्बन्ध विच्छेद हो गया है) कर ससुराल विदा किया जाता है। ढोल देकर उसे यह अहसास कराया जाता है की अब उसका पीहर से अलगाव हो चुका है, उसकी गोत्र भी ससुराल पक्ष की होगई एवं उसके मरने पर उसका सूतक तक पीहर पक्ष को नही लगेगा. इसके उपरांत भी पीहर पक्ष का दायित्व समाप्त नंही हो जाता। लड़की के गौने, प्रथम प्रसव का खर्च, एवं उसके ससुराल में खुशी तथा गमी, उसकी अपनी संतान के विवाह में मायरा आदि अवसरों पर पीहर पक्ष द्वारा समय समय पर नकद, वस्त्र, आभूषण देना होता है। अगर ससुराल वाले लड़की को छोड़ देते है तो उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी भी पीहर पक्ष की होती है। इसके उपरांत पीहर पक्ष द्वारा उसके सारे रीतिरिवाजों के पूरा करने के उपरांत जब उसका पिता मरता है तो वह पैतृक सम्पति में भाई के बराबर का हिस्सा दिए जाने की कानून सम्मत मांग करती है तो यह उसके पीहर पक्ष के लिए बड़ा ही पीडादायक होता है। एक मध्यम वर्गीय परिवार पैतृक सम्पति में मिलनेवाले हिस्से से अधिक पाहिले ही खर्च कर चुका होता है। अधिकतर लड़किया अपने ससुराल वालों की लालची प्रवृति में सहयोग देकर अपना हिस्सा लेकर आपने पीहर पक्ष का प्रेम, सोहाद्र समाप्त कर अपने हिस्से को ज्यादा कीमत देने वाले को बेच कर परिवार की जायदाद का विखंडन कराने की कारक होती जा रही है. लड़की का विवाह वैसे भी दूसरे गांव या शहर किया जाता है। दूर गांव या शहर में रहकर वह पीहर की सम्पति की देखभाल करने में वैसे ही वह असमर्थ होती है तो फ़िर उसका हिस्सा लेना कहाँ तक उचित है.

हिंदू समाज में प्रचलित हजारों वर्षों से चले आरहे रीतिरिवाजों को आधुनिकता के परिवेश में बिना उसके दूरगामी प्रभावों का अध्ययन किए, बिना पब्लिक डिबेट के हमारे प्रगतिशील विचारधारा के पुरोधा इस प्रकार केवल हिंदू समाज के कानूनों में हस्तक्षेप कर अपनी पीठ थपथपा सकते है परन्तु अन्य संप्रदाय के कानूनों में उनकी तनिक भी दखलंदाजी करने की हिम्मत नही होती. इन्दोर की शाहबानो के प्रकरण में बावजूद उच्चतम न्यायालय के आदेशों के संविधान संशोधन द्वारा उक्त समुदाय के निजी कानून में हस्तक्षेप रोका गया। तो फ़िर भारत में केवल हिंदू कानून ही मात्र दखान्दाजी के योग्य है। कहाँ गयी भारत में सामान नागरिक संहिता लागु करने की बात। क्या प्रगतिशीलता का ठेका मात्र हिंदू कानूनों में बदलाव से ही है। सरकार की इस अनावश्यक निजी कानूनों में हस्तक्षेप ने विभिन्न समुदायों को त्रस्त कर रखा है। इसका तोड़ किसी समुदाय में तो परिवार की विधवा को चादर ओड़कर सम्पति विभाजन रोकने का रास्ता अपनाया जाता है तो अन्य समुदायों में लड़की को मान मनोव्वल कर रुपया देकर उससे उसका हिस्से का १०० रूपये के स्टांप पर त्याग पत्र लिखवा कर पारिवारिक सम्पति का विभाजन रोकने के प्रयास किए जाते है.

Saturday, April 11, 2009

दूध को और कितना महंगा करोगे ?

सरस (उदयपुर सहकारी डेरी) ने गत वर्ष मात्र दो माह में ही दूध को २५ प्रतिशत महंगा किया अवं अब पुनः एक रूपया प्रति लीटर महंगा करने की तेयारी

उदयपुर की सहकारी संभाग की एक मात्र सरस डेरी ने गत वर्ष मई माह में मात्र दो माह के अन्तराल में ही दूध के २५ प्रतिशत भाव बड़ा कर मध्यम वर्ग के उपभोक्ता की कमर तोड़ दी है एवं अब ११ माह बाद पुनः दूध के भाव बढाने की तैयारीमें प्रस्ताव डेयरी फेडरेशन , जयपुर के पास भेजा है। दूध रोज़मर्रा की जिन्दगी का अत्यावाशक पेय है। सुबह उठते ही उपभोक्ता की चाय की चुस्की को बे स्वाद करना कतई उचित नंही हैं। विशेष रूप से गरीब एवं मध्यम वर्गीय उपभोक्ता पर जबरदस्त चोट है। दूध जैसे पेय को एक वर्ष के अन्तराल में २५ से ३० प्रतिशत महंगा करने से देश के होनहार बच्चे जिनमें अधिकांश पहले से ही कुपोषण के शिकार हैं को और कुपोषित होने को विवश होना पड़ेगा। सहकारिता का तात्पर्य दूध उत्पादक किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिले तथा उपभोक्ता को भी वाजिक दम पर दूध विक्रय किया जाय।

डेयरी का यह तर्क गले नंही उतरता की उन्होंने दूध के क्रय मूल्य को गत वर्ष २२५ रुपये प्रति किलो वसा(फेट) से बड़ा कर २८० रुपये प्रति किलो फेट कर किसोनों को लाभ पहुँचाने की खातिर दूध के भाव बढाये हैं अवं अभी २९० रुपये प्रति किलो फेट करके दूध को एक रुपये प्रति लीटर और महंगा किया जानाप्रस्तावित हैं। यहाँ प्रश्न यह उठता है की आख़िर जो दूध किसान से जिस भाव पर ख़रीदा गया है उस दूध को प्रोसेस अवं पैकिंग करने पर प्रतिलीटर कितना वाजिक खर्च आना चाहिए । डेयरी में तकनिकी एवं मैनेजमेंट के दक्ष लोगों को उंच वेतनमान पर लगा रखा है। उनको उंच वेतन एवं सुविधाएँ देने के उपरांत भी उनका दूध के प्रोसेसिंग, पैकिंग, वितरण आदि के खर्च में कमी कर सकने में उनकी अक्षमता ने उनकी योग्यता पर प्रश्न चिह्न खड़ा किया है। आख़िर राज्य का निरीह उपभोक्ता इस सफ़ेद हाथी को चुपचाप कहाँ तक बर्दास्त करता रहेगा? एक और देश में थोक सूचकांक घाट रहा है, तेल एवं अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के भाव कम किए जा रहे है तो दूसरी और हमारी सहकारी क्षेत्र की डेयरी दूध के भाव बढाने को आमादा है। गरीब एवं मध्यमवर्गी जनता की तो इस मंहगे दूध ने पहले से ही कमर तोड़ राखी है एवं अब और महंगा करने से गरीब व् मध्यमवर्गीय उपभोक्ता को अब मेहमानवाजी चाय की बजाय पानी से करने को बाध्य होना पड़ेगा।

वास्तव में डेयरी प्रशासन का यह तर्क थोथा एवं मिथ्या है की किसान से ख़रीदे गए दूध की ज्यादा कीमत अदा करने से दूध का भाव बढाया जाना उनकी मजबूरी है। अब सुविज्ञ पाठक स्वयं विवेचन करें की जो दूध डेयरी प्रशासन अपने फुल क्रीम ब्रांड (व्होल मिल्क)से २५ रुपया प्रतिलीटर में बेच रहा है उसका किसान से २८० रूपया प्रति किलो फेट डर से क्रय मूल्य मात्र १६.८० रुपया बैठता है। इसी प्रकार टोंडदूध की लागत ८.४० रूपया एवं विक्रय मूल्य २० रूपया, डबल टोंड की लागत ४.२० रुपया एवं विक्रय मूल्य १८ रुपया, स्टैण्डर्ड दूध की लागत १२.६० रुपया होकर विक्रय मूल्य २२ रुपया होने से डेयरी के दूध की लागत एवं विक्रय मूल्य के मध्य अंतर क्रमश फुल क्रीम में ८.२० रुपया, टोंड में १२.६० रुपया, डबल टोंड में १३.८० रुपया एवं स्तंदर दूध में ९.४० रुपया प्रति लीटर बैठता है। इतना मार्जिन किसी अन्य व्यापारमें देखने सुनने में नही आया। डेयरी प्रशासन आंकडों के मकड़जाल एवं वाक्पटुता से किसानो को अधिक कीमत देने की मात्र थोथी घोषणा कर जनता को गुमराह कर उसके इस जीवनदायी पेय को कभी किसानों की आड़ लेकर तो कभी गर्मी का रोना रोकर महंगा करता जा रहा है। ऐसा भी नंही है की डेयरी प्रशासन दौराने प्रोसेसिंग किसी भी तरह की ताकत की दवाएं या विटामिन्स या काजू बादाम इस दूध में मिलकर ज्यादा पौष्टिक बना रहा हो जिससे की दूध की लागत में बढोतरी किया जाना अपरिहार्य हो। नीचे दिए गए विवरण से सुधि पाठक स्वयं निर्णय करें की दूध का खरीद एवं विक्रय मूल्य का अन्तर कितना वाजिब एवं जायज है
रेट प्रति लीटर
..०८ १६..०८ ३०..०८ १५..08

क्रय विक्रय क्रय विक्रय क्रय विक्रय क्रय विक्रय
१- टोंड दूध ३ प्रतिशत वसा -- ६.७५ १५.०० ६.७५ १७.०० ८.४० १८.०० ८.४० २०.००
२- डबल टोंड १.५% वसा -- ३.३७ १३.०० ३.३७ १५.०० ४.२० १६.०० ४.२० १८.००
३- स्टैण्डर्ड दूध ४.५% वसा -- १०.१२ १७.०० १०.१२ १९.०० १२.६० २०.०० १२.६० २२.००
४- फुल क्रीम होल मिल्क ६% फेट १३.५० २०.०० १३.५० २२. १६.८० २४.०० १६.८० २५.००
ऊपर दी गयी सारिणी में हलके अंक क्रमश ..०८, १६..०८, ३०..०८ एवं १५..०८ का खरीद मूल्य दर्शाते हैं जबकि बोल्ड अंक उपर्युक्त तारीखों के दूध के विक्रय मूल्य दर्शाते हैं

अतः जन हित में सहकारी डेयरी के इस मकड़जाल से उपभोक्ताओं को अवगत एवं जागरूक किया जाना आवश्यक है ताकि उन्हें बार बार कीमतें बड़ा कर शोषित कियस जाने के प्रति डेयरी प्रशासन एवं सरकार को आगाह किया जा सके। किसानों को अधिक देने का जो ढिंढोरा पीटा जा रहा हैं वह सर्वथा अनुचित हैं। आज वस्तुस्थिति यह है की किसान से स्टैण्डर्ड दूध १२.६० रूपये में खरीद कर उसे २२ रूपये में बेचा जाना कहाँ तक उचित है? क्या डेयरी के सक्षम अधिकारी एवं फेडरेशन में बैठने वाले जन प्रतिनिधि, तकनिकी एवं विशेषज्ञ दूध के प्रोसेसिंग, ट्रांसपोर्टेशन, पैकिंग, विज्ञापन एवं भारी प्रशसनिक खर्चों में कटोती कर दूध के खरीद एवं विक्रय मूल्य के अंतर को कम कर ४ रुपया प्रति लीटर तक लाकर अपनी दक्षता प्रतिपादित करते हुए जनता एवं आम उपभोक्ता को राहत नही दे सकते?


Monday, March 2, 2009

Acquisition/Conversition of Fertile land is Self Dying Step

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Wednesday, February 4, 2009

Housing, Commercial,Industrial Development Vs. Agriculture land and Helpless Farmer

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Tuesday, February 3, 2009

Population explosion Vs. Fertile land Availability

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